असंठित श्रमिकों की वर्तमान स्थिति 

unorganized people

साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह”

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित अधिकतर विकासशील देशों में श्रमिको का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के तहत आता है।

कुछ अनिगमित उद्यम निर्धनता रेखा से थोड़ा उपर आते हैं, क्योंकि ये संगठित उद्योगों को माल की आपूर्ति करते हैं, जैसे विद्युत उद्योग, मोटर-कार उद्योग, परिधान बनाने वाली फर्में इत्यादि, परंतु वे श्रमिक जो खुद के लिए काम करते हैं, जेसे व्यापारी, पटरी पर सामान बेचने वाले, कुली, नाई, बूट पाॅलिश करने वाले तथा घरों में काम करने वाले- कम उत्पादन तथा कम आय के गरीबी से निजात नहीं पा सकते। उनके द्वारा किया जाने वाला कार्य निम्न कौशल, निम्न उत्पादन तथा निम्न आय वाला होता हैं, जो उन्हें उपर उठाने के लिए नाकाफी होता है। इसी प्रकार अधिकांश अनौपचारिक दिहाड़ी मजदूर अनियत हैं, उनका रोजगार असुरक्षित होता है और वे आमतौर पर शोषण के शिकार होते है। घर में ही काम करने वाले श्रमिक जैसे बीड़ी, अगरबत्ती या परिधान बनाने वाले, खुद कच्चा माल खरीदते हैं और सामान तैयार करके बेचते है, परंतु अधिकांश ऐसे श्रमिक बिचैलियों के जरिए उजरती काम करते है। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम जिंदा रहने के लिए करना पड़ता है, क्योंकि रोजगार का कोई अन्य बेहतर विकल्प नहीं होता।

हालांकि असंगठित क्षेत्र हमेशा ही मौजूद रहा है, लेकिन यह नजर में आया 1970 में, जब कीथ हार्ड द्वारा आईएलओ के लिए अक्रा, घाना, के श्रम बाजारों का अध्ययन किया गया। अनौपचारिक क्षेत्र अभिव्यक्ति उन गरीब श्रमिकों का वर्णन करने के लिए गढ़ी गयी थी, जो कड़ी मेहनत करते थे, लेकिन जन अधिकारियों द्वारा न ही उन्हें कोई पहचान दी जाती थी और न ही उनका कोई रिकाॅर्ड होता था, न ही उन्हें नियमित किया जाता था और न ही उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान की जाती थी। वर्ष 1991 में आयोजित अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के 78 वें सत्र में ‘अनौपचारिक क्षेत्र की द्विविधा’ पर पहली बार विचार-विमर्श किया गया। द्विविधा यह थी कि क्या आइएलओ और उसके संघटकों को अनौपचारिक क्षेत्र को प्रोत्साहित करना चाहिए चूंकि वह क्षेत्र रोजगार तथा आय प्रदान करता है, या उन्हें उस क्षेत्र को नियमों तथा सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना चाहिए, जिसका अर्थ यह होगा कि श्रमिकों की लगातार बढ़ती हुई संख्या को रोजगार तथा आय प्रदान करने की उसकी क्षमता संभवतः कम हो जायेगी। वर्ष 2002 में अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के 90वें सत्र में इस समस्या पर परिचर्चा हुई। द्विविधा अभी भी बरकरार है, लेकिन अब उसके परिणाम एवं पेचीदगियां बहुत बढ़ गयी है। पूर्व की भविष्यवाणियों के विपरीत अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और भी तीव्रता से विश्व के हर कोने में फैल रही है, जिसमें औद्योगिक देश भी शामिल है- अब यह अल्पकालीन या अवशिष्ट घटना नहीं रही।

हालांकि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के विषय में एक आशावादी विचार था कि वैश्वीकरण के साथ और अधिक रोजगार उपलब्ध होंगे तथा औपचारिक श्रमिक औपचारिक रोजगार में लग जायेंगे। (उदाहरणार्थ पटरी पर सामान बेचने वाला दूकान का मालिक बन जायेगा) और बेहतर तथा नियमित श्रम मिलना संभव हो जाएगा। दुर्भागयवश असलीयत एकदम उलट है। बहुत से लोग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं और न ही वे औपचारिक अर्थव्यवस्था में अपना कोई व्यवसाय आरंभ कर पाते है।

कुछ ऐसे मामले भी देखने में आये है जहां अनौपचारिक क्षेत्र के कुछ श्रमिक नये श्रम कौशल, संगठन और सामूहिक प्रयास के सहारे गरीबी से छुटकारा पा सके है।

यह आवश्यकता है कि इन सफलताओं के पीछे के कारण है उनका अध्ययन किया जाये और दूसरे क्षेत्रों में उनके विस्तार एवं पुनरावृति की संभावनाओं को आंका जाये। यह भी समझने की आवश्यकता है कि व्यवस्थित निर्माण तथा सेवा क्षेत्रों में त्वरित रोजगार के विकास की अनुपस्थिति के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अधिकांश श्रमिकों के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार जीविकोपार्जन का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत बना रहेगा। इस कारण सब संबंधित पक्षों – सरकार, श्रमिक संघ, आइएलओ इत्यादि- को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की गतिविधियां बाजार से सुदृढंतापूर्वक जुड़ी हों और अर्थव्यस्था के अन्य क्षेत्रों से उनके सहजीवी संबंध स्थापित हों।

भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में संलग्न 37 करोड़ श्रमिकों में से 25 करोड़ 20 लाख पुरूष तथा 11 करोड़ 80 लाख महिला श्रमिक है। देश के कुछ घरेलू उत्पाद में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का योगदान 60 प्रतिशत है। अनौपचारिक क्षेत्र का रोजगार गतिहीन नहीं है, बल्कि गतिशील, परिवर्तन है, रोजगार के कई प्रकार के नये अवसर प्रदान करता है, लेकिन साथ ही नये प्रकार की असुरक्षाएं भी सामने आती हैं।

इसलिए यहां इस बात की आवश्यकता है कि भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों की वर्तमान स्थिति तथा उनके सामाजिक-आर्थिक स्तर का आंकलन किया जाए।

कृषि श्रमिकों की स्थिति

भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के 37 करोड़ श्रमिकों में से 23 करोड़ 60 लाख तो कृषि क्षेत्र से ही जुड़े है। इनमें छोटे तथा हाशिये के किसान, पट्टेधारी तथा कृषि मजदूर शामिल है। कुल ग्रामीण परिवारों में से 32.2 प्रतिशत कृषक परिवार हैं।

नेशनल सांपल सर्वे आॅर्गनाईजेशन (एनएसएसओ) के आंकड़ों के अनुसार ग्रमीण परिवारों में से 10 प्रतिशत के पास कोई भूमि नहीं है और 90.5 प्रतिशत कृषक 2.01 हेक्टेयर से कम भूमि के मालिक है। केवल 9.5 प्रतिशत परिवारों के पास दो हेक्टेयर से अधिक भूमि हैं। कुल मिलाकर, भारतीय कृषि में छोटे तथा मध्यम दर्जे के कृषकों का बाहुल्य है, जो कि अक्सर जमीन के छोटे आकार, फसल की कम पैदावार, उंची लागत तथा उपज की नीची दरों के कारण गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने पर बाध्य होते है। चीन के विरीत, जहां 85 प्रतिशत कृषक परिवार ऐसे है जिनका कम से कम एक सदस्य गैर कृषि रोजगार से जुड़ा हुआ है, भारत में कृषक परिवारों के पास रोजगार के पर्याप्त विकल्प नहीं है।

एनएसएसओ के 61वें चक्कर के अनुसार ग्रामीण आबादी का 24.9 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे है। कई क्षेत्रों- जिनमें असम, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश के बहुत बड़े से हिस्से, महाराष्ट्र, ओडिसा, दक्षिणी राजस्थान, तामिलनाडु के उत्तरी तटीय इलाके, उत्तर प्रदेश (सिवाय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के) तथा पश्चिम बंगाल का पूर्वी तथा हिमालयी क्षेत्र शामिल है- खुद की खेती करने वाले परिवारो ंमें निर्धनता दर 30 से 50 प्रतिशत है। भूमिहीन कृषि श्रमिकों में निर्धनता की प्रतिशत दरें इस प्रकार हैः असम के पश्चिमी मैदानी इलाके में 71.8, झारखण्ड में 83, उत्तर बिहार में 78, मध्य बिहार में 71.9 प्रतिशत, पूर्वी हरियाणा में 67 प्रतिशत, महाराष्ट्र के कई हिस्सों में 72 से 76 प्रतिशत तथा मध्य प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम इलाके में 89.6 प्रतिशत आबादी निर्धन है।

विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार भारत जैसे अल्पविकसित देशों मे निर्धनता रेखा एक अमरीकी डाॅलर प्रतिदिन या 365 अमीरीकी डाॅलर प्रतिवर्ष प्रति-व्यक्ति है। इस परिभाषा से संभवतः 75 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय निर्धनता रेखा से नीचे हैं।

भारत सरकार के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे का तात्पर्य है शहरी इलाकों में प्रति व्यक्ति आय 296 रूपए प्रति माह और ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति आय 276 रूपए प्रति माह, यानी 10 रूपए प्रति दिन से भी कम।

इसके अतिरिक्त कृषि के व्यवसायीकरण की वजह से अनियत श्रमिकों की संख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। कृषि में अनियत श्रमिकों को रोजगार सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती और न ही वे सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के तहत आते है। कृषि में अनियत श्रमिकों में से 66.5 प्रतिशत शारीरिक, पशुपालन तथा मछलीपालन में लगा दिये जाते है। अनियत श्रम कम मजदूरी तथ काम के नीचे स्तर के कारण सबसे कम आमदनी वाला होता है, और ऐसे श्रमिकों की बहुत बड़ी संख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। वर्ष 1999-2000 के आंकड़ों के अनुसार कृषि में लगे अनियत श्रमिकों की औसतन रोजाना मजदूरी केवल 41.81 रूपए, पुरूषों के लिए 32.73 रूपए महिलाओं के लिए और 27.44 रूपए बच्चों के लिए थी। इसके अलावा बहुत से क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में कृषि-संबंधी रोजगार और वास्तविक मजदूरी दोनों में गिरावट की प्रवृति देखी गयी है।

गैर-कृषि श्रमिकों की स्थिति

गैर-कृषि श्रमिकों की कुल संख्या में से 13 करोड़ 40 लाख या 83 प्रतिशत अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम कर रहे हैं। इनमें से 10 करोड़ 70 लाख पुरूष तथा 2 करोड़ 70 लाख महिला श्रमिक है। एनएसएस के 55वें चक्कर (1999-2000) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में स्वयं का रोजगार करने वाले गैर कृषि श्रमिकों में से 25 प्रतिशत पुरूष तथा 33.8 प्रतिशत महिलाएं गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे। तथापि गैर-कृषि श्रमिकों में से 34 प्रतिशत वेतन सहित नियमित रोजगार में थे, अतः इन्हें अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिक नहीं कहा जा सकता। लेकिन 75 प्रतिशत महिला श्रमिकों के पास नियमित रोजगार नहीं था और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध थी। अन्य क्षेत्रों के मुकाबले गैर-कृषि क्षेत्र में अनियत श्रमिकों की स्थिति अत्यधिक खराब थी। करीब 30 प्रतिशत पुरूष तथा 39 प्रतिशत महिला अनियत श्रमिक गरीब बताये गये थे। खुद के रोजगार में लगे गैर-कृषि श्रमिकों में से 36 प्रतिशत घर में ही काम करते थे, जिनमें 67 प्रतिशत पुरूष तथा 23 प्रतिशत महिलाएं थीं। 79 प्रतिशत महिलाओं एवं 63 प्रतिशत पुरूषों को उजरती (अर्थात हर तैयार वस्तु पर) मजदूरी दी जाती थी, जिसकी गणना शोषण के निकृष्टतम रूपों में की जाती है। श्रमिकों को वर्ष में औसतन 301 दिनों का काम मिलता था, लेकिन महिला श्रमिकों को औसतन केवल 285 दिनों का। अनियत तथा उजरती काम करने वाली महिला श्रमिकों की तो और भी दयनीय स्थिति थी- उन्हें औसतन केवल 255 दिन ही काम मिलता था। अनियत तथा उजरती श्रमिकों की रोजगार असुरक्षा इस बात से उजागर होती है कि उनमें से बहुतेरे तो 25 से 36 प्रतिशत तक बेरोजगारी का सामना कर रहे है।

महिला श्रमिकों की स्थिति

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में महिला श्रमिको ंको घरेलू जिम्मेदारियों के चलते कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उन्हें कई बार नियोक्ताओं और ठेकेदारों द्वारा दी गयी सजा भी भुगतनी पड़ती है। इन्हीं खामियों के कारण उन्हें मजबूरन अंशकालिक रोजगार या घर ही में काम करना पड़ता है। इसके अलावा रोजगार पर लगी महिलाओं में से अधिकांश के नियोक्ता के साथ कच्चे श्रम करार है और इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं होती, जैसे वेतन-सहित छुट्टिया, बीमारी की छुट्टी, स्वास्थ्य बीमा, श्रमिक मुआवजा, सेवानिवृति लाभ। दरअसल 56 प्रतिशत महिलाओं के साथ केवल मौखिक करार ही होता है। कृषि क्षेत्र में महिला श्रमिकों की स्थिति और भी खराब है। वे कमरतोड़ महेनत करती है, लेकिन ऐसे कामों के लिए उनको सरकार से मान्यता नहीं मिलती क्योंकि उन्हें अकुशल श्रमिक कहा जाता है।

आधुनिक तकनीक, जैसे ट्रैक्टर, छिड़काव, मशीनें तथा सिंचाई के उपकरण के प्रयोग से पुरूषों के कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक मेहनत-मशक्कत का काम हल्का कर दिया हैं, लेकिन महिलाओं के तमाम कामों में तकनीकी सुधार नही के बराबर हुआ है। इसके अलावा, महिलाओं को वही या उसी प्रकार के कार्य के लिए पुरूषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है। आर्थिक उदारीकरण के परिणामस्वरूप नौकरियों के स्वरूप भी तीव्रता से बदल रहे हैं, और उनके लिए नये कौशल की आवश्यकता है। महिलाओं के लिए स्थिति प्रतिकूल है, क्योंकि उनमें शिक्षा, कौशल तथा पूंजी की कमी होती है।

बाल श्रम की स्थिति

वर्ष 2001 की जणगणना के अनुसार भारत में 1 करोड़ 26 लाख बाल श्रमिक हैं, जिनमें से 53.7 प्रतिशत लड़के तथा 46.3 प्रतिशत लड़कियां हैं। देश के कुल बाल मजदूरों में से 40 प्रतिशत चार राज्यों‘- आंध्र प्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में है। अनुमानतः 80 प्रतिशत बाल श्रमिक कृषि क्षेत्रों में लगे है। जवाहरात की पाॅलिशिंग, सिल्क के कपड़े की बुनाई तथा गलीचा निर्माण में भी बहुत बड़ी संख्या में बाल श्रमिक काम करते है।

बाल श्रम मानव शोषण के हीनतम रूपों में से एक है, जो बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने और एक सभ्य नागरिक बनने से रोकता है। यह देश के आर्थिक विकास को भी धीमा करता है, क्योंकि यही बाल श्रमिक बड़े होकर अशिक्षित तथा अकुशल श्रमिकों की विशाल संख्या में जुड़ जाते है जिनमें उत्थान की क्षमता बहुत सीमित होती है। इसके अतिरिक्त बाल श्रमिकों की कम मजदूरी वयस्क श्रमिकों की मजदूरी के स्तर को नीचा करती है और परिवार के अन्य सदस्यों को सारे परिवार को केवल जिंदा रखने के लिए न्यूनतम मजदूरी पर काम करना पड़ता है। इस भांति बाल श्रम का अर्थ है निर्धनता का और अधिक विषम होना।

ग्रामीण श्रमिकों का जीवन स्तर

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के अधिकतर श्रमिक ग्रामीण इलाकों में रहते है, जहां घोर निर्धनता, बेरोजगारी, ऋणग्रस्तता, निरक्षरता तथा बुनियादी सुविधाओं जैसे पक्की सड़के, बिजली, सुरक्षित पेयजल तथा स्वास्थ्य देखभाल- के अभाव के कारण उनका जीवन स्तर दयनीय होता है।

निर्धनता और ऋणग्रस्तता की समस्या

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, एनएसएस के 61वें चक्कर के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र की 24.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, उनमें से बहुत से अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए है। इसके अतिरिक्त एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले राज्यों जैसे पंजाब तथा हरियाणा के किसान भारी कर्जों तले दबे होते है। इसके मुख्य कारण है, छोटे-छोटे खेत, निम्न उत्पादकता तथा आमतौर पर उत्पाद की कम कीमतें। कुछ राज्यों में भारी कर्जों के कारण कई किसानों द्वारा आत्महत्या के समाचार मिले है। अनौपचारिक क्षेत्र के अन्य श्रमिक भी ऋणग्रस्त हो सकते है, विशेषकर तब जब उन्हें रोजगार और आय की सुरक्षा नहीं होती।

बेरोजगारी तथा न्यूनतम भत्ते की समस्या

एनएसएस के 61वें चक्कर के अनुसार, प्रतिदिन की स्थिति देखते हुए, 8 प्रतिशत ग्रामीण पुरूष श्रमिक तथा 7 प्रतिशत महिला श्रमिक बेरोजगार है। अनियत तथा उजरती श्रमिकों में बेरोजगारी अपेक्षाकृत अधिक है- 25 से 36 प्रतिशत तक। इसके अतिरिक्त, 10.5 प्रतिशत ग्रामीण पुरूष श्रमिक तथा 13.3 प्रतिशत ग्रामीण महिला श्रमिक अल्परोजगार पर हैं, चूंकि उनके पास नियमित रोजगार नहीं है। रोजगार में वार्षिक वृद्धि दर जहां 1983-84 में 2.04 प्रतिशत से 1994-2003 के दौरान दर नाकारात्मक (-0.34 प्रतिशत) हुई है।

इसके अलावा अकुशल कृषि श्रमिकों की औसत दैनिक मजदूरी अभी भी बहुत कम है- कुछ क्षेत्रों में तो प्रतिदिन 50 रूप्ए से भी कम। कई राज्यों में हाल के वर्षों में कृषि श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में वार्षिक वृद्धि दर घटी है। कुछ राज्यों में ग्रामीण गैर-कृषि मजदूरी दरों में भी गिरावट की प्रवृति नजर आती है। इस भांति, निम्न मजदूरी रदों तथा रोजगार के कम अवसरों के कारण अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के भूमिहीन श्रमिक गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बिताने को मजबूर हैं।

शिक्षा तक पहुंच

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिक निर्धन हैं, क्योंकि वे निरक्षर है और ऐसी शिक्षा तथा कौशल से वंचित हैं, जो कि आगे बढ़ने के लिए बहुत जरूरी है। भारतीय जनगणना 2001 के अनुसार, देश की कुल आबादी में से 24 प्रतिशत पुरूष तथा 46 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर है।

ग्रामीण भारत में (उच्चतर माध्यमिक स्तर तक) स्कूलों का अनुपात 1,000 आबादी पर 0.85 प्रतिशत है, और एनएसएस की ग्रामीण सुविधाओं पर रिपोर्ट (रिपोर्ट आॅन विलेज फसिलिटिज) के अनुसार 28 प्रतिशत गांवों में प्राथमिक पाठशालाएं नहीं है। यही हाल अन्य शिक्षा संस्थाओं के मामले में भी है। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आइटीआइज) 88 प्रतिशत गांवो से तथा नेत्रहीनों, गूंगों, बहरों तथा मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए विशेष स्कूल 85 से 97 प्रतिशत गांवों से 10 कि.मी. से भी दूर स्थित होते है।

भौतिक ढांचों पर निवेष के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता में सार्थक उन्नति भी आवश्यक है। अधिकांश ग्रामीण स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा में जोर होता है शिक्षार्थियों को सरकारी नौकरियों के लिए तैयार करने पर, न कि उन्हें रोजगार के उभरते हुए अवसरों का लाभ उठाने के योग्य बनाने पर। परिणाम-स्वरूप बहुत से शिक्षित ग्रामीण युवा बेरोजगार रहते है।

स्वास्थ्य सुरक्षा

ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुरक्षा सेवाएं अपर्याप्त तथा कमजोर है। औसतन प्रत्येक जन स्वास्थ्य केंद्र को 31,758 व्यक्तियों की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है-हिमाचल प्रदेश में 22,229 व्यक्तियों की, मध्यप्रदेश में 41,418 व्यक्तियों तक की। इसी प्रकार हर डाॅक्टर को उत्तर प्रदेश में 4,999 व्यक्तियों तथा बिहार में 38,107 व्यक्तियों को सेवाएं उपलब्ध करानी होती है।

इसके अतिरिक्त, 55 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को सुरक्षित पेय जल उपलब्ध नहीं है। फलस्वरूप जच्चा-बच्चा मृत्यु दर कई क्षेत्रों में बहुत अधिक है। इसके अलावा 54 प्रतिशत गांव निकटतम प्राथमिक चिकित्सा सेवा केंद्र पांच कि.मी. से भी अधिक दूरी पर है और 27 प्रतिशत 10 कि.मी. से भी अधिक दूरी पर। ग्रामीण सुविधाओं पर रिपोर्ट के अनुसार केवल 10 प्रतिशत गांवों में दवाईयों की दूकान है और 20 प्रतिशत गांवों में निजी क्लीनिक या डाॅक्टर है। केवल 1.9 गांवों में ही निजी अस्पताल है, जबकि 61 प्रतिशत गांव सरकारी अस्पताल/स्वास्थ्य केंद्र से 10 कि.मी. दूर है।

अन्य बुनियादी ढांचों तक पहुंच

अन्य बुनियादी आवश्यकताएं, जैसे सड़कें, बिजली, मार्केट, डाकघर, बैंक, पशु-चिकित्सालय, त्वरित बहुमुखी ग्रामीण विकास की धुरी हैं, जिन पर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के लाखों छोटे और हाशिये के किसानों तथा भूमिहीन श्रमिकों का भविष्य निर्भर करता है। ग्रामीण सुविधाओं पर रिपोर्ट के नवीनतम आंकड़े दर्शाते है कि 25 प्रतिशत गांवों में अभी भी बिजली नहीं पहुंची है। केवल 18 प्रतिशत गांवों में ही नलकों द्वारा पीने योग्य पानी आता है और 55 प्रतिशत गांवों में नलकूपों तथा हैंडपंप्स से पीने का पानी प्राप्त किया जाता है।

डाकघर 78 प्रतिशत गांवों में स्थापित नहीं किये गये हैं, और 66 प्रतिशत में दो कि.मी. के भीतर तारघर/टेलीफोन/ईमेल सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

इसके अतिरिक्त 57 प्रतिशत से भी अधिक गांवों में 2 कि.मी तक ऐसी सड़के नहीं है, जो हर मौसम के लिए उपयुक्त हों। केवल 6.6 प्रतिशत गांवों में बैंक शाखा है और 8.1 प्रतिशत में पशु-चिकित्सालय/डिस्पेंसरी है। केवल 26 प्रतिशत गांवों में दो कि.मी. के भीतर या तो स्थाई बाजार है या फिर साप्ताहिक बाजार लगता है।

प्रवसन

कृषि श्रमिक आमतौर पर नये क्षेत्रों (ग्रामीण तथा शहरी, दोनों) में चले जाते हैं, क्योंकि जहां वे रहा करते थे, वहां मजदूरी कम मिलती है तथा रोजगार के अवसर अपर्याप्त होते है। परंतु नये स्थानों में प्रवासी श्रमिकों का जीवन कदापि सुखद नहीं होता। स्थानीय श्रमिक उनका अपना प्रतिद्वंद्वी मानते है और आमतौर पर प्रवासी श्रमिकों द्वारा किये गये रोजगार करारों के निम्न स्तर के लिए जिम्मेदार होते है।

कुल मिलाकर अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक रोजगार के निम्न स्तर, कम मजदूरी तथा शिक्षा तथा कौशल के अभाव के कारण बेहद गरीबी भरा जीवन जीते है। श्रम बाजार में महिला श्रमिक आमतौर पर मजदूरी तथा रोजगार के अवसरों में भेदभाव का शिकार होती है। बाल श्रमिकों की बहुतायत के कारण स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन, 2002 ने ठीक ही कहा है कि ‘वर्तमान तथा दीर्घकालीन स्तरों पर उत्कृष्ट श्रम सुनिश्चित करने तथा गरीबी कम करने हेतु आवश्यक है कि न केवल नकारात्मक अविर्भाव बल्कि उनके मूल कारणों से भी निबटा जाए। इन मूल कारणों में सम्मिलित हैः कानूनी तथा संस्थागत बाधाएं, जो श्रमिकों का औपचारिक बनने या बने रहना कठिन कर देती है। राष्ट्रीय सरकार की ऐसी नीतियां जो बहुधा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष औपचारिक अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन अवरूद्ध करती है, शक्तिशाली तथा प्रभावशाली बाजारी और गैर-बाजारी संस्थाओं की अनुपस्थिति या उन तक पहुंच न होना, जनांकिकी प्रवृत्तियां जैसे गांवों से शहरों की ओर प्रवसन, महिलाओं तथा असमर्थ समूहों के खिलाफ भेदभाव तथा प्रतिनिधित्व तथा नेतृत्व की कमी। जब तक इन मुख्य कारणों से प्रभावशाली ढंग से जूझा नहीं जाएगा, तब तक मान्यताप्राप्त, सुरक्षित एवं उत्कृष्ट श्रम के लिए स्थिरतापरक प्रयास नहीं हो सकते।

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों की समस्याओं से निबटने हेतु सरकार के प्रयासः भारत सरकार द्वारा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाये गये है। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों के मुद्दों से विशेष रूप से जूझने के लिए राष्ट्रीय श्रम आयोग (1969), राष्ट्रीय महिला आयोग (1987), राष्ट्रीय ग्रामीण श्रम आयोग(1992) की स्थापना की गयी। इन आयोगों द्वारा क्रमशः अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों, महिला श्रमिकों तथा ग्रामीण श्रमिकों की समस्याओं को उजागर किया। इन आयोगों ने सरकार तथा अन्य नागरिक सामाजिक संगठनों के लिए कई सुझाव प्रस्तुत किये है।

तमिलनाडु तथा मध्यप्रदेश में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकः चूंकि नाॅर्वे श्रमिक शिक्षा परियोजना तमिलनाडु तथा मध्यप्रदेश में स्थित है, इन दो राज्यों में स्थिति का संक्षिप्त वर्णन उपयोगी होगा। हालांकि तमिलनाडु में ग्रामीण निर्धनता कम है, यहां बाल श्रमिकों की संख्या अधिक तथा ऋणग्रस्त किसानों की संख्या अत्यधिक है। तथापि, तामिलनाडु में कृषि तथा गैर-कृषि श्रमिकों, दोनों की वास्तविक मजदूरी दरें काफी उंची हैं, अर्थात राष्ट्रीय औसतों से अधिक।

मध्य प्रदेश में गरीबी अपेक्षाकृत अधिक है तथा कृषि व गैर-कृषि श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी की वृद्धि दरें अपेक्षाकृत कम है। अन्य मापदंडों से आंकने पर भी मध्यप्रदेश को निम्न श्रेणी में रखा जायेगा।

हाल ही में असंगठित श्रमिकों पर राष्ट्रीय आयोग ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों द्वारा सामना करने वाली समस्याओं पर दृष्टि डाली और उनकी सामाजिक-आर्थिक दशा को सुधारने के लिए उचित सुझाव प्रस्तुत किये।

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