शिन्दे की चिट्ठी के निहितार्थ 

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
मालेगांव में २००६ में हुये बम धमाका मामले में कुछ अभियुक्त पुलिस ने पकडे हुये थे । उन पर मुकद्दमा चल रहा था और पुलिस अपनी जाँच कर रही थी । इसे संयोग ही कहा जायेगा कि ये सभी अभियुक्त मुसलमान थे । इनका मुसलमान होना ही देश के अल्पसंख्यक आयोग को सक्रिय करने के लिये पर्याप्त था । आयोग के अध्यक्ष वजाहत वहाबुल्लाह ने गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय दोनों को ही स्पष्ट लिखा कि सरकार इन नौ मुसलमान युवकों को ज़मानत पर बाहर निकालने की व्यवस्था करे । शायद न्याय व्यवस्था में बाहरी हस्तक्षेप का यह निकृष्टतम उदाहरण कहा जा सकता है । तब कुछ लोगों ने समझा था कि यह बजाहत वहाबुल्लाह की अपनी अति सक्रियता के कारण हो सकता है । इससे भारत सरकार का कुछ लेना देना नहीं है । भारत सरकार इन प्रश्नों पर इस प्रकार शर-ए-आम साम्प्रदायिक दृष्टिकोण तो नहीं अपना सकती ।
लेकिन हाल ही में देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर आदेश दिया है कि आतंकवाद की घटनाओं में अनेक प्रान्तों में निर्दोष मुसलमानों को जांच एजेंसियां जानबूझकर फँसा रही हैं । ——— आतंकवाद के प्रति कोई ढिलाई न दिखाई जाये , लेकिन इसके साथ ही जाँच एजेंसियाँ ध्यान रखें कि ऐसा करते समय सामाजिक और साम्प्रदायिक समरसता को आघात न लगे । इसके बाद शिन्दे लगभग धमकाने वाली भाषा पर उतर आये । उन्होंने राज्य सरकारों को धमकाया कि जो पुलिस अधिकारी मुसलमानों को ग़लत इरादे से गिरफ़्तार करते हैं , उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी । उन्होंने कहा कि इस प्रकार के मुसलमानों को तुरन्त रिहा ही न किया जाये बल्कि उनके पुनर्वास के लिये उनको मुआवज़ा भी दिया जाये । यह ठीक है कि शिन्दे यह सब लिखने में अल्पसंख्यक शब्द का ही प्रयोग करते हैं लेकिन उसका अभिप्राय मुसलमानों से है इसमें कोई शक नहीं । सुशील कुमार शिन्दे से कोई भी पूछ सकता है कि आपको यह स्वप्न कहाँ से आया कि इस देश में मुसलमानों को जानबूझकर फँसाया जा रहा है ? इस प्रश्न के उत्तर का बन्दोबस्त भी सोनिया कांग्रेस की सरकार ने कर रखा है । उसने पहले ही केन्द्र में एक अल्पसंख्यक मंत्रालय स्थापित कर दिया है । सोनिया कांग्रेस ने केन्द्रीय सरकार में यह मंत्रालय २००६ में स्थापित किया था । ध्यान रहे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जवाहर लाल नेहरु , लाल बहादुर शास्त्री , इंदिरा गान्धी और राजीव गान्धी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी अल्पसंख्यक मंत्रालय की रचना नहीं की थी । ऐसा पहली बार सोनिया गान्धी के कार्यकाल में ही हुआ जब उसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दफना कर सोनिया कांग्रेस का पारिवारिक संगठन खडा कर लिया । अब सोनिया गान्धी को रोकने वाला कोई नहीं था । सोनिया कांग्रेस ने मुसलमानों के नाम पर केवल राजनीति ही शुरु नहीं की बल्कि मुसलमानों को इस देश की मुख्य सांस्कृतिक धारा से तोडने के लिये प्रयास प्रारम्भ कर दिये । राजेन्द्र सच्चर आयोग , रंगनाथ मिश्रा आयोग इत्यादि की स्थापना , मुसलमानों को मजहब के आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के प्रयास , राष्ट्रीय सलाहकार समिति का साम्प्रदायिक दंगा एवं लक्षित हिंसा निरोधक बिल का प्रारुप एवं उसे अधिनियम बनाने के प्रयास सभी इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं । पिछले कुछ साल से मुसलमानों को अपने लिये अलग विद्यालय स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है । मज़हबी शिक्षा देने के लिये कोई सम्प्रदाय अपने बच्चों के लिये अलग से व्यवस्था करे , यह बात समझ में आ सकती है । मुसलमान सम्प्रदाय भी इस काम के लिये मदरसे चलाता था , जिसमें मौलवी मुसलमान बच्चों को मज़हबी तालीम देते थे और हैं । पर मजहबी तालीम के अलावा , पढाई लिखाई के लिये मुसलमान बच्चे भी दूसरे सामान्य स्कूलों में ही पढते थे । लेकिन अब केन्द्र सरकार मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे इन मदरसों को सरकारी स्कूलों के समानान्तर सामान्य विद्यालयों की तर्ज पर ही विकसित कर लें और इनमें मज़हबी तालीम के अलावा अन्य विषय भी पढ़ाना शुरु कर दें । इसके लिये सरकार इन मदरसों को करोड़ों रुपये भी मुहैया करवा रही है । इस का अर्थ क्या है ? सरकार की कोशिश है कि मुसलमानों के बच्चे बाक़ी देशवासियों के बच्चों के साथ स्कूलों में न आयें बल्कि सभी से अलग थलग इन मदरसों में ही रहें । इन सब धन्धों में समन्वय बिठाने के लिये अलग से अल्पसंख्यक मंत्रालय भी गठित कर दिया गया ।
इसी मंत्रालय के मंत्री रहमान खान ने शिन्दे को एक चिट्ठी लिख कर कहा कि मुसलमानों का कहना है कि इस देश में ग़ैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिये बने क़ानूनों के राक्षसी प्रावधानों का दुरुप्रयोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जा सकता है । वैसे तो रहमान खान से पूछा जा सकता है कि जिन कानूनों का वे जिक्र कर रहे हैं , वे भी तो उन्हीं की पार्टी की सरकार ने बनाये हैं । फिर उन के प्रावधानों को वे राक्षसी कैसे कहते हैं ? शिन्दे ने तुरन्त रहमान खान के इन तमाम आरोपों से सहमति जताते हुये राज्य सरकारों को यह आपत्तिजनक चिट्ठी लिख दी । यदि चिट्ठी पर सुशील कुमार शिन्दे का नाम न होता तो कोई भी इसे पाकिस्तान द्वारा भारत सरकार को लिखी चिट्ठी समझने का धोखा खा सकता है ।
देश के मुस्लिम समुदाय ने कभी नहीं कहा कि उन के साथ देश के अन्य लोगों की बजाय कोई अलग से व्यवहार किया जाये । आतंकवादी गतिविधियों में जो भी संलिप्त है उस पर क़ानून के अनुसार कार्यवाही होनी ही चाहिये । किसी भी निर्दोष को नहीं पकड़ा जाना चाहिये । इसमें हिन्दु या मुसलमान का प्रश्न कहाँ आता है ? भारत की सबसे बडी मुस्लिम संस्था मुस्लिम राष्ट्रीय मंच तो इस को लेकर आन्दोलनरत है । लेकिन सोनिया कांग्रेस की सरकार को आतंकवाद से तो लड़ना नहीं है , उसे तो इसके बहाने हिन्दु मुसलमान को लड़ाना है । हिन्दुस्तान के लिये यह पुरानी यूरोपीय नीति है । इसलिये शिन्दे आतंकवाद में भी राज्य सरकारों से हिन्दु मुसलमान का प्रश्न उठा रहे हैं और पुलिस अधिकारियों को परोक्ष रुप से धमका भी रहे हैं ।
पुलिस देश भर में रोज़ अनेक लोगों को क़ानून की विभिन्न धाराओं में गिरफ़्तार करती है । उन पर मुकद्दमा चलता है । अनेक को सजा हो जाती है और अनेक छूट जाते हैं । ज़रुरी नहीं कि छूटने वाला निर्दोष ही हो । वह अपराधी भी हो सकता है और मिलीभगत से छूट गया हो सकता है । या फिर पुलिस पूरा जोर लगा कर भी उसके विरुद्ध सबूत इक्कठे न कर पाई हो । इसी प्रकार वह सचमुच निर्दोष भी हो सकता है , जिसे जाँच एजेंसी ने ग़लती से या जानबूझकर पकड़ लिया हो । यह हमारी जाँच प्रणाली और न्याय प्रणाली का ‘इनबिलट सिस्टम’ है । लेकिन इसमें हिन्दु मुस्लिम का प्रश्न कहीं नहीं है । यह प्रणाली अपने सभी गुणदोषों सहित सभी देशवासियों पर समान रुप से लागू होती है । इस का नफ़ा नुक़सान सभी को समान रुप से भोगना पड़ता है । लेकिन अब शिन्दे चाहते हैं कि किसी आपराधिक मुकद्दमें में कोई मुसलमान बरी होता है तो सरकार उसकी क्षतिपूर्ति करेगी । उसे मुआवज़ा दिया जायेगा ।यदि सरकार की यही मंशा है तो यदि कोई हिन्दू किसी आपराधिक मामले में बरी हो जाता है तो उसको मुआवज़ा क्यों नहीं ?
सोनिया कांग्रेस की सरकार उसी रास्ते पर चल पड़ी है जिस रास्ते पर चलकर कभी अंग्रेज़ बहादुर ने जिन्ना को पैदा किया था । यह सरकार मुसलमानों के लिये अलग स्कूल , अलग बैंक , अलग सिविल क़ानून , और अब अलग फ़ौजदारी क़ानून बनाने के रास्ते पर निकल पड़ी है । शायद अगला क़दम अलग निर्वाचन क्षेत्र हो सकता है , जिसमें मुसलमान ही मुसलमान प्रत्याशी को वोट दे सकता है । सोनिया गान्धी को शायद न पता हो कि इस देश में हर गोरी चमड़ी वाले को अंग्रेज़ ही समझा जाता है और अंग्रेज़ों ने इस देश को तोड़ कर और अपने साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिये मुसलमानों को देश की सांस्कृतिक धारा से तोड़ कर पाकिस्तान बनवाया था । आश्चर्य है कि लगभग सात दशक बाद सोनिया गान्धी का संगठन उसी रास्ते पर चल पड़ा है । और सर रायबहादुरों सुशील कुमार शिन्दे को क्या कहा जाये ? वे तब भी ‘हर मैजिस्टी’ के कहने पर इस प्रकार की चिट्ठियाँ लिखते थे और आज भी ‘हर मैजस्टी’ के इशारे को समझ कर ऐसी चिट्ठियाँ लिख रहे हैं ।

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