देवी की पूजा और शक्ति पीठ 

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अभिषेक गुप्ता

 

हिंदु पूजा पद्धति में आदि देवताओं के आराधना का विधान है। इन आदि देवों में गणेश, शिव, सूर्य, विष्णु एवं दुर्गा (शक्ति) शामिल है। आदि मातृ शक्ति के रूप में देवी पूजा का विशेष प्रचलन एवं महत्व है। वेदों में शक्तिपूजा के रूप में पार्वती पूजा का उल्लेख मिलता है। बौद्ध धर्म में भी देवी के रूप में तारा देवी की पूजा का विशेष महत्व है। रामायण, महाभारत में भी राम द्वारा देवी पूजन एवं पाण्डवों द्वारा भगवती पूजन का वर्णन है। ‘राम की शक्ति पूजा’ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ओजस्वी हिंदी कविता है।मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी को शक्ति स्वरूपों के नौ रूपों में शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्र घंटा, कुष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायनी, काल रात्री, महागौरी एवं सिद्धिदात्री के पूजा का विधान  है। वही ंतांत्रिक साधना में रूद्रयामल तंत्र के अनुसार देवी के दस महाविद्याओ में माॅ काली, तारा, महात्रिपुरा सुन्दरी, भुवनेश्वरी, छिन्न मस्तिका देवी, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी एवं कमला के रूप में प्रतिष्ठित है। कहा जाता है कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस नियमित बगलामुखी का जाप किया करते थे। देवी भक्तों के लिए नवरात्र में शक्ति उपासना का विशेष महत्व है। नवरात्र वर्ष में चार बार दो मुख्य वासंतीय (चैत्र) एवं शारदीय (आश्विन) तथा दो गुप्त- आसाढ़ एवं माघ में आता है। मुख्य नवरात्र की पूजा सर्व विदित रूप से तथा गुप्त नवरात्र की पूजा तांत्रिक साधना के लिए की जाती है। वैसे तो देवी अराधना संपूर्ण भारत वर्ष में होती है किंतु पूर्वाेत्तर भारत में शारदीय नवरात्र धूम-धाम से मनाने की प्रथा है। अंग्रेजों के आने के पहले नवरात्र की पूजा मंदिरों तक ही होती थी तथा सम्भ्रान्त परिवार में जई पर कलश रख कर देवी की प्राण प्रतिष्ठा होती थी। यह आश्विन शुक्ल पक्ष के प्रारंभ से नवमी तिथि तक होता था। कलकत्ता के जमींदारों ने अंग्रेज अधिकारियों को उत्सव में सम्मिलित करने के लिए घर से बाहर मूर्ति स्थापित कर पूजा का प्रचलन आरम्भ किया जो धीरे-धीरे बंगाल से बाहर विभिन्न प्रदेशों में फैल गया।आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नवरात्र का त्योहार बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। नवरात्र में देवी मां के व्रत रखे जाते हैं। स्थान-स्थान पर देवी मां की मूर्तियां बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती है। घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है। शारदीय नवरात्र शाक्त संप्रदाय वालों के लिए विशेष महत्व रखता है। इन नौ दिनों में भक्त देवी के विभिन्न स्वरूपों की अराधना वेदोक्त एवं तन्त्रोक्त विधि से करते हैं। भारत के विभिन्न शक्ति पीठों पर इस समय में अनेक अनुष्ठान होते है, जहां दक्षिण में मां की स्तुति ललितासहस्त्र नाम से होती है, वहीं बंगाल भाषी क्षेत्र में चण्डी पुराण से भक्त मां की स्तुति करते है। उत्तर भारत में श्री दुर्गा की पूजा श्री दुर्गा सप्तशती से की जाती है।श्री दुर्गासप्तशती मार्कण्डेय पुराण से निकली है और इसके रचैता श्री मार्कण्डेय ऋषि है और श्री दुर्गासप्तशती में 700 श्लोक है एवं इसके पाठ और पारायण से देवी 700 वर अपने भक्त को देती है। इसका प्रमाण महर्षि मेघा ने राजा सुरथ को देते हुए कहा था- तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्। आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गा-पवर्गदा।’ अर्थात महाराज आप उन्हीं भगवती परमेश्वरी की शरण ग्रहण कीजिए। वे आराधना से प्रसन्न होकर मनुष्यों को भोग  स्वर्ग और अपुनरावर्ती मोक्ष प्रदान करती है।इसी के अनुसार आराधना करके एश्वर्यकामी राजा सुरथ ने अखण्ड राज्य प्राप्त किया तथा वैराग्य चाहने वाला समाधि वैश्य ने दुर्लभ ज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की। इस मन्त्रमय ग्रंथ के आश्रय से न मालूम कितने आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा भक्त अपना इष्ट मनोरथ सफल कर चुके हैं। श्री दुर्गा देवी ने स्त्री के लौकिक रूप में रहते हुए अनेक अलौकिक शक्तियां समाहित की थी।देवी की शक्तियों ने असुर संहार के लिए अनेक रूप धारण किए। नवरात्र में देवी के नव रूपों की पूजा होती है। श्री दुर्गा सनातन धर्म परंपरा में अभिन्न अंग रखती है एवं वह पंच देवता में से एक हैं। श्री दुर्गा के बीज मंत्र में ऐं हृीं क्लीं सरस्वती, लक्षमी एवं शक्ति का प्रतीक हैं। नवरात्र केवल पूजा के महत्व के लिए ही नहीं अपतिु निरोग्य रनहे के लिए भी आवश्यक हैं, शारदीय नवरात्र एवं वसंतीय नवरात्र का समय ऐसा है जब ऋतुएं बदली हैं। बदलते मौसम को भारतीय प्राच्च शास्त्र में यमराज का जबड़ा कहा गया है। इसी असंतुलन को दूर रखने के लिए शास्त्रो ने हमे नौ दिनों में संयमीत भोजन, आचरण एवं उपवास की आवश्यकता को बतलाया है। इस लिए जो शाक्त है उनके लिए विशेष एवं अन्य व्यक्तियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से नवरात्र महत्व रखता है। श्री दुर्गा कितनी शक्तिवान है इसका अंदाजा त्रेता युग में भगवान विष्णु के अवतार रामचंद्र ने रावण को हराने के लिए शक्ति उपासना की थी एवं रावण पुत्र इंदजीत की शक्ति उपासना सहस्त्र चंडी महायज्ञ को भंग भी कराया अन्यथा शक्ति का आर्शीवाद प्राप्त होने के बाद विष्णु अवतारी राम भी रावण कुल का विनाश नहीं कर पाते तो निः संदेह अवतार जब अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए शक्ति की आराधना की तब साधारण जन्य को शक्ति की क्या जरूरत है समझ सकते हैं। एवं अंदाजा लगा सकते है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पूर्व काल में दक्ष प्रजापति ने ‘बृहस्पति सर्व’ नामक एक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में बह्मा, विष्णु और इंद्र आदि सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया था, किंतु दक्ष प्रजापति ने जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शिव को नहीं बुलाया। भगवान शिव की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने एवं महादेव के रोकनेपर भी देवी सती यज्ञ में भाग लेने गई। यज्ञ-स्थान पर देवी सती ने अपने पिता से शिव जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा तो पिता का शिव के लिए उग्रविरोध और भगवान शंकर के लिए अपशब्द का भाव सुन देवी अपमान से पीडि़त हुई और यज्ञ-कुंड की अग्नि मंे कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। शिव को जब इस घटना का पता चला तो क्रोध के आवेश में आकर शिव ने अपनी जटा तोड़ पृथ्वी पर फेकी तब वीर भद्र नामक भगवान रूद्र का महाबलशाली गण प्रकट हुआ और रूद्र देव से आदेश पाकर यज्ञ कुंड का नाश कर दिया। भगवान शिव ने यज्ञ नाश के बाद देवी सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर रख कर और दुखी मन से जहां-तहां घूमने लगे। रूद्र देवता के दुःख से ब्रह्मांड को बचाने के लिए श्री हरि विष्णु द्वारा माता सती के पार्थिव शरीर को सुदर्शन चक्र से सभी अंगों को विछेदित किया गया। तदनंतर जहां भी सती के शव का विभिन्न अंग और आभूषण गिरे वहां शक्ति पीठों का निर्माण हुआ। कालांतर में सती का पुनरजन्म पार्वती के रूप में हिमालय राज के यहां हुआ, देवी पार्वती ने घोर तपस्या कर इस जन्म में पुनः पति रूप में भगवान शिव को प्राप्त किया।पौराणिक ग्रंथ तंत्र साहित्य और तंत्र चूडामणि में 51-52 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है। निम्नलिखित सूची ‘तंत्र चूडामणि’ में वर्णित इक्यावन शक्ति पीठों की है। बावनवां शक्ति पीठ दूसरे ग्रंथों के आधार पर है।
1. हिंगुल या हिंगलाज शक्ति पीठ, यह स्थान कराची से लगभग 125 किलोमीटर दूर है। यहां देवी की सिर का ऊपरी भाग गिरा है। यहां देवी की पूजा कोट्टरी के रूप में होती है तथा इनके भैरव भीमलोचन है।2. देवी की आंख जहां गिरी है, उस स्थान के ऊपर मतभेद है। पाकिस्तान के सुक्कर स्टेशन के निकट शर्कररे देव स्थान तथा भारत के हिमाचल प्रदेश में बिलासपुर में स्थित नैनादेवी मंदिर है। इन दोनों स्थानों पर मां की पूजा महिष मर्दिनी के रूप में होती है तथा इनके भैरव क्रोधीश है।3. सुगंध मंदिर बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किलोमीटर दूर सोंध नदी के तीर पर स्थित है। यहां देवी सती की नासिका गिरी है। यहां देवी सती की नासिका गिरी है। यहां मां सुनंदा के रूप में पूजा की जाती है तथा इनके भैरव त्रयंबक है।4. अमरनाथ के पहलगांव में देवी का गला गिरा है। यहां देवी महामाया के रूप में पूजी जाती है तथा इनके भैरव त्रिसंध्येश्वर है। यह देव स्थान कश्मीर राज्य में अवस्थित है।5. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला में स्थित ज्वाला जी, शक्तिपीठ है। यहां मां की जीभ गिरी है। यहा देवी की पूजा अंबिका के रूप में होती है तथा इनके भैरव उन्मत्त है।6. जालंधर, पंजाब में छावनी स्टेशन के निकट देवी तलाब मंदिर है यहां देवी का बाया वक्ष गिरी था। इनके भैरव भीषण है तथा यहां माता की पूजा त्रिपुरमालिनी के रूप में होती है।7. वैद्यनाथ धाम मंदिर झारखंड के देवघर में है। यहां जगदम्बा का हृदय गिरा है एवं इस स्थान पर इनकी पूजा जय दुर्गा के रूप में होती है। इनके भैरव वैद्यनाथ है।8. नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के निकट गुजयेश्वरी शक्ति स्थान है। यहां देवी के दोनों घुटने गिरे है एवं मां की पूजा यहां महाशिरा के रूप में होती है। इनके भैरव कपाली है।9. कैलाश पर्वत के मानस शक्ति स्थान जो मानसरोवर, तिब्बत के समीप एक पाषाण शिला है। यहां माता का दाया हाथ गिरा है। यहां इनकी पूजा दाक्षायनी के रूप में होती है एवं इनके भैरव का नाम अमर है।10. उड़ीसा के उत्कल में बिराज मंदिर है। यहां देवी की नाभी गिरी है। यहां मा की पूजा विमला के रूप होती है एवं इनके भैरव जगन्नाथ है।11. नेपाल के गडंक नदी के तट पर पोखरा में मुक्तिनाथ शक्तिपीठ है। यहां मां का मस्तक गिरा है एवं यहां इनकी पूजा गंडकी चंडी के रूप में होती है। इनके भैरव चक्रपाणि है।12. पश्चिम बंगाल वर्धमान जिले में बाहुल देव स्थान अजेय नदी के तट पर स्थित है। यहां सती का बाया हाथ गिरा था। यहां देवी की पूजा देवी बाहुला के रूप में होती है। इनके भैरव भीरूक है।13. पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में उज्जनि मंदिर है। यहां माता की दायी कलाई गिरी है। इनकी पूजा यहां मंगल चंद्रिका के रूप में होती है एवं इनके भैरव कपिलांबर है।14. माता बाढ़ी पर्वत शिखर पर स्थित मंदिर त्रिपुरा में है। यहां मां का दाया पैर गिरा है। इनकी पूजा यहां त्रिपुर सुंदरी के रूप में होती है। इनके भैरव त्रिपुरेश है।15. बांग्लादेश के छत्राल, चंद्रनाथ पर्वत शिखर जो कि चिस्टागौंग जिला में स्थित मंदिर, शक्ति पीठ है। इस स्थान पर मां की दायी भुजा गिरी है। यहां इनकी पूजा भवानी के रूप में होती है एवं इनके भैरव चंद्रशेखर है।16. त्रिस्रोत मंदिर पश्चिम बंगाल के जलपाइगुडी जिला में स्थित है। यहां माता का बाया पैर गिरा है। इनकी पूजा भ्रामरी के रूप में होती है तथा इनके भैरव अंबर है।17. असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामगिरी कामाख्या मंदिर है। यहां मां का योनि भाग गिरा है। यहां देवी की पूजा कामख्या के रूप में होती है एवं इनके भैरव उमानंद है।18. जुगाड्या जो खीरग्राम में पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले स्थित शक्तिपीठ है। यहां मां का दाये पैर का बड़ा अंगूठा गिरा है। इस स्थान पर देवी की जुगाड्या शक्ति के रूप में पूजा होती है। इनके भैरव क्षीर खंडक है।19. पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में स्थित कालीपीठ मंदिर है। यहां शक्ति का दाये पैर का अंगूठा गिरा है। इनकी पूजा यहां कालिका के रूप में होती है। इनके भैरव नकुलीश है।20. उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के संगम प्रयाग पर स्थित एक मंदिर है। यहां माता की हाथ की अंगुली गिरी है। इनकी पूजा यहां ललिता के रूप में होती है। इनके भैरव भव है।21. बांग्लादेश के सिल्हैट जिले में जयंती स्थित शक्ति पीठ है। यहं माता की बायी जंघा गिरी है। इनकी पूजा यहां जयंती के रूप में होती है। इनके भैरव क्रमादीश्वर है। 22. पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शीदाबाद में स्थित किरीट देव स्थान शक्ति पीठ है। यहां माता का मुकुट गिरा है। इनकी पूजा विमला के रूप में होती है। इनके भैरव सांवर्त है।23. उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर स्थित मंदिर शक्ति पीठ है। इस स्थान पर मां के मणिकर्णिका का भाग गिरा है। इनकी पूजा यह विशालाक्षी अथवा मणिकर्णी के रूप में हेाती है। इनके भैरव काल है।24. तमिलनाडु के कन्याश्रम स्थित भद्रकाली या कुमारी मंदिर शक्ति पीठ है। यहां देवी की पीठ गिरी है। इनकी पूजा श्रवणी के रूप में होती है। इनके भैरव निमिष है।25. हरियाणा के कुरूक्षेत्र में स्थित शक्ति पीठ जहां देवी की एड़ी गिरी है। इनकी पूजा सावित्री के रूप में होती है एवं इनके भैरव स्थनु है।26. राजस्थान के अजमेर में पुष्कर के समीप मणिबंध शक्ति पीठ है। यहां माता के दोनों पहुचिया गिरी है। इनकी पूजा यहां गायत्री के रूप में होती है एवं इनके भैरव सर्वानन्द है।27. बांग्लादेश के उत्तर-पूर्व सिल्हैट टाऊन में स्थित श्री शैल शक्ति पीठ जहां मां का गला गिरा है एवं इनकी पूजा यहां महालक्ष्मी के रूप में होती है। इनके भैरव शंभरानंद है।28. पश्चिम बंगाल के बीर भूम जिले में कोपई नदी के तट पर स्थित कांची शक्ति पीठ जहां मां की अस्थि गिरी है। इनकी पूजा यहा देवगर्भ के रूप में होती है एवं इनके भैरव रूरू है।29. मध्य प्रदेश के अमरकंटक में सोन नदी के तट पर एक गुफा में कमलाधव शक्ति पीठ स्थित है जहां मा का बाया नितंब गिरा है। मां की पूजा यहां काली के रूप में होती है तथा इनके भैरव असितांग है। 30. मध्य प्रदेश के अमरकंटक में शोन्देश शक्ति पीठ है जहां का दाया नितंब गिरा है। यहां देवी की पूजा नर्मदा के रूप में होती है एवं इनके भैरव भद्रसेन है।31. उत्तर प्रदेश में चित्रकूट के रामगिरि पर स्थित मंदिर है जहां सती का दाया वक्ष गिरा था। मां की पूजा यहां शिवानी के रूप में होती है तथा इनके भैरव चंदा है।32. उत्तर प्रदेश के मथुरा से समीप वृंदावन का भूतेश्वर महादेव मंदिर शक्ति पीठ है। यहां देवी के केश का गुच्छा अथवा चूडामणि गिरा है। इनकी पूजा यहां उमा के रूप में होती है एवं इनके भैरव भूतेश है।33. तमिलनाडु के कन्याकुमारी से तिरूवनंतपुरम मार्ग पर स्थित शुचितीर्थम शिव मंदिर, शुचि शक्ति पीठ है जहां देवी का ऊपरी दाड़ गिरा है। इनकी पूजा यहां नारायणी के रूप में होती है एवं इनके भैरव संहार है।34. पंचसागर अज्ञात शक्ति पीठ है जहां देवी का निचला दाड़ गिरा है। इनकी स्वरूप ताराही का है एवं इनके भैरव महारूद्र है। अभी तक यह स्थान खोजा नहीं जा सका है।35. बांग्लादेश के बामुर स्टेशन से समीप भवानीपुर गांव में स्थित करतोयतत शक्ति मंदिर है। यहां देवी का बाया पायल गिरा है। इनकी पूजा अर्पण के रूप में होती तथा इनके भैरव वामन है।36. श्री पर्वत स्थित मंदिर कश्मीर के लद्दाख में एवं अन्य भत्तानुसारेण श्री शैलम, आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में स्थित शक्ति पीठ है। यहां माता का दाया पायल गिरा है एवं इनकी पूजा यहां श्री सुंदरी के रूप में होती है। इनके भैरव सुंदरानांद है।37. पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में विभाष स्थित शक्ति पीठ है यहां सती की बायी एड़ी गिरी है। इनकी पूजा यहां कपालिनी के रूप में होती हैं। इनके भैरव शर्वानंद है।38. गुजरात प्रांत के जूनागढ़ जिले में सोमनाथ मंदिर से समीप प्रभाष स्थित शक्ति स्थान है। यहां देवी का आमाशय गिरा है एवं इनकी पूजा यहां चंद्रभाग के रूप में होती है। इनके भैरव वक्रतुंड है।39. मध्य प्रदेश के क्षिप्रा नदी के तट पर भैरवपर्वत पर स्थित शक्ति स्थान है जहां देवी के ऊपरी ओष्ठ गिरे है। यहां इनकी पूजा अवंति के रूप में होती है तथा इनके भैरव लंबकर्ण है।40. महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी की घाटी में जन्मस्थान स्थित शक्तिपीठ है। यहां माता की ठोड़ी का भाग गिरा है। इनकी पूजा यहां भ्रामरी के रूप में होती है तथा इनके भैरव विकृताक्ष है।41. आंध्र प्रदेश के गोदावरी नदी के तीर पर कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास सर्वशैल स्थित स्थान है। यहां देवी का गाल गिरा है एवं इनकी पूजा यहां विश्वेश्वरी के रूप में होती है। इनके भैरव दंडपाणि है।42. राजस्थान में भरतपुर के समीप बिराल स्थित शक्ति स्थान है जहां देवी की बाये पैर की अंगुली गिरी है। इनकी पूजा यहां अंबिका के रूप में होती है। तथा इनके भैरव अमृतेश्वर है।43. पश्चिम बंगाल में हुगली जिला के समीप रत्नाकार नदी के तीर पर स्थित रत्नावली शक्ति स्थान है। यहां देवी का दायां स्कंध गिरा था एवं इनकी पूजा यहां कुमारी के रूप में होती है तथा इनके भैरव शिव है।44. भारत-नेपाल सीप पर मिथिला स्थित शक्ति पीठ है जहां देवी का बाया स्कंध गिरा है। इनकी पूजा उमा के रूप में यहां होती है। इनके भैरव महोदर है।45. पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में नलहाटी स्थित देव स्थान है जहां देवी की पैर की हड्डी गिरी है। इनकी पूजा कलिका के रूप में यहां होती है एवं इनके भैरव योगेश है।46. कर्नाट अज्ञात शक्ति पीठ है जहां देवी के दोनों कान गिरे हैं। इनका स्वरूप जय दुर्गा का है तथा इनके भैरव अभिरू है। अभी तक यह स्थान खोजा नहीं जा सका है।47. पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में पापहर नदी के तीर पर वक्रेश्वर स्थित शक्ति पीठ है जहां मां का भ्रूमध्य भाग गिरा है एवं इनकी पूजा महिषमर्दिनी के रूप में होती है। इनके भैरव वक्रनाथ है।48. बांग्लादेश के खुलना जिले में ईश्वरीपुर स्थित यशोर देव स्थान है जहां देवी का हाथ एवं पैर गिरा है। इनकी पूजा यहां यशोरेश्वरी के रूप में होती है एवं इनके भैरव चंदा है।49. पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में अट्टाहास स्थित शक्ति पीठ है जहां सती का ओष्ठ गिरा है। इनकी पूजा यहां फुल्लरा के रूप में होती है तथा इनके भैरव विश्वेश है।50. पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में सैंथिया रेलवे स्टेशन के समीप नंदीपुर स्थित शक्ति पीठ है जहां सती के गले का हार गिरा है। इनकी पूजा यहां नंदनी के रूप में होती है एवं इनके भैरव नंदिकेश्वर है।51. लंका में अज्ञात स्थान पर वह देव स्थान है (एक मत के अनुसार, मंदिर ट्रिकोमोली में है, एवं पुर्तगाली बमबारी में नष्ट हो चुका है। एक स्तंभ शेष है। यह प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के समीप है।) यहां देवी का पायल गिरा है एवं इनका स्वरूप यहां इंद्रक्षी का है एवं इनके भैरव राक्षसेश्वर है।यहां निम्नांकित सूची तंत्र चुडामणि के आधार पर दी गई है। अन्य तन्त्र शास्त्र, गं्रथ अथवा साहित्य से इसी सूची में मतभेद हो सकते हंै।प्राचीन गं्रथों का निर्माण श्रुति के आधार पर हुआ है इसलिए शक्ति पीठों की संख्या एवं स्थान में मतभेद स्वाभाविक है। 51 शक्तिपीठों के अतिरिक्त 101 उप पीठों का भी उल्लेख कुछ ग्रंथों में मिलता है। कई स्थानों पर अवस्थित मंदिर को मूल स्थान बताया जाना भी एक मतभेद का कारण है। यथा-देवी की आंख जहां गिरी है उसके संबंध में चार स्थानों से दावा किया जाता है। 1. पाकिस्तान के सुक्कर स्टेशन के निकट शर्कररे देव स्थान, हिमाचल प्रदेश में विलासपुर में स्थित नैनादेवी, नैनीताल स्थित नैनी देवी एवं हरिद्वारा स्थित नैनी देवी। फिर भी अधिकतर ग्रंथ 51 शक्तिपीठों को ही मान्यता देते हैं। विन्धायचल उत्तर प्रदेश एवं वैष्णो देवी (जम्मू) 51 की सूची में नहीं है किंतु उत्तर प्रदेश भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध देवी स्थान है। महत्व की बात है कि शक्तिपीठ सांस्कृतिक भारत के स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं तथा साथ ही विशाल भारत के भौगोलिक एकता का दिव्यदर्शन कराते हैं। लगता है कि भगवान शिव विशाल भारत के सांस्कृतिक एवं भौगोलिक एकता के प्रतीक हैं। तथा देवी मातृशक्ति के शक्तिशाली स्वरूपा हैं। जिस स्वरूप में लक्ष्मी-सरस्वती एवं काली का समावेश है।

 

 

अभिषेक गुप्ता
About the author: अभिषेक गुप्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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